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Ek Saty
#1
एक दिन
सुखा दी जाएंगी
सारी नदियाँ
या फिर
कर दी जाएंगी तब्दील
नालियों में ।
एक दिन
सजा दिए जाएंगे
सारे पेड़
गगनचुम्बी
इमारतों की
बैठकों में
या शयनकक्षों में ।
बस उसी एक दिन
खो बैठेगा मानव
टिटहरी का नाद,
झींगुर का गीत
और जंगल का संगीत
ओ मानव!
प्रकृति के
वास्तविक उत्तराधिकारी हैं
पशु-पक्षी, कीट-पतंगे ।
तकनीक और
सामर्थ्य के बल पर
तुम बसा तो
सकते हो
अति आधुनिक बस्तियां
मगर बच नहीं सकते
प्रकृति के वास्तविक
उत्तराधिकारियों के
रोष से ।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है
अतिशय शांतिप्रिय
गजराज का बढ़ता क्रोध
जो कर रहा है ध्वस्त
मानव बस्तियों को निरंतर ।
ओ मानव!
विकास की जिस
दौड़ को
आरंभ किया है तुमने
उसका अंत करेगी प्रकृति ।
जानते हो क्यों?
क्योंकि तुम्हारी तकनीक
या तथाकथित विकास
निरंतर अग्रगामी है
इसके विपरीत प्रकृति
स्थिरता प्रिय है
जिसे प्रिय है
स्वयं से संबद्ध
सूक्ष्म से सूक्ष्म अवयव ।
ओ मानव!
याद करो वो सुनामी
जिसने बरपाया
था क़हर
मानव सभ्यता पर
मगर साथ ही साथ
ये भी याद रखना
उस सुनामी में
हताहत न हुआ था
कोई पशु-पक्षी या
कीट-पतंगा
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